Celebrity Writer-बागपन की बारूदी कलम/संवेदना की स्याही से..

“मैं बाग़ी” की कलम से..

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नोट परिवर्तन के  साथ सोशल मीडिया पर मजाक, आखिर हम किधर जा रहे हैं ? 

प्रो.(डॉ.) डी. पी. शर्माधौलपुरी“  14/11/2016 

आज भृष्टाचार पर नकेल एवं काले धन की निकासी अथवा सियासी मौद्रिक खेल तो सिर्फ सरकार अथवा अर्थशास्त्री ही समझ सकते हैं कि इसके दूरगामी परिणाम क्या और कैसे होंगे लेकिन सोशल मीडिया को ” गैर-सोशल “अफवाई औजार आज जरूर मिल गया है / हर कोई गलत या सही अथवा जायज या  गैर जायज का भेद किये बिना न्यूज़ की कतरन अथवा तोड़े मरोड़े तथ्यों को बिना सोचे, समझे  इधर उधर भेजने और अफवाह फ़ैलाने में अपना एवं सोशल मीडिया पर अपनी अति सक्रियता एवं राष्ट्रीय मौद्रिक नीति का जानकार होने का दम  भर रहा है / ये सही है कि हर भारतीय को वैचारिक स्वतंत्रता का अधिकार संविधान प्रदत्त है परंतु कहीं हम इस नासमझी एवं अतिउत्साह के जूनून में देश को अथवा देश की अर्थ नीति को जो कि किसी तानाशाह  ने नहीं वल्कि चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार के प्रतिनिधियों ने बहुमत एवं लोककल्याण की भावना के साथ  बनाई एवं लागू  की है, को नुक्सान तो नहीं पहुंचा रहे?

इतनी भी क्या जल्दवाजी है कि एक राष्ट्रीय महत्व के सरकारी निर्णय को हम बिना सोचे समझे मजाक एवं गैर जरुरी करार देकर कुछ भी हिंदी अथवा अंग्रेजी में, अखबारी भाषा के हूबहू फर्जी खबर बनाकर अथवा सरकारी आदेश के रूप में कंप्यूटरीकृत क्लिप बना उस पर भारतीय गणराज्य चिन्हों को चिपकाकर सोशल  मीडिया अथवा  इन्टरनेट के माध्यम से वायरल  कर दें / जरा  सोचिये कहीं आप जाने अथवा अनजाने में कोई राष्ट्रीय अपराध तो नहीं कर रहे ? ज्ञात रहे कि आपके वैचारिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ साथ कुछ कर्त्तव्य भी जुड़े हुए हैं/  सन २०१५ में सुप्रीम कोर्ट ने “आई टी एक्ट २०००” की धारा  ६६ A  के पुलिस द्वारा दुरुपयोग को ध्यान में रखते हुए यद्यपि वैचारिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्र के खिलाफ असंवैधानिक करा देते हुए इस पर रोक लगा दी थी/ आज उसके दुष्परिणाम सुप्रीम कोर्ट के फैसले एवं संविधान के विपरीत  पुनः  देखने को मिल रहे हैं / लोग सभ्य एवं संवैधानिक भावनाओं के विपरीत कुछ भी अनर्गल , असामाजिक, भाषायी अशिष्टता का प्रदर्शन करते हुए समय एवं ऊर्जा के साथ साथ धार्मिक एवं सामाजिक वैमनस्य फैला रहे हैं  जो कि पुनः एक सवालिया मुद्दा खड़ा करता है कि  कहीं ये साइड इफेक्ट्स हमारे एक और संवैधानिक ताने वाने  अर्थात धार्मिक सहिष्णुता एवं सामाजिक विविधिता को छतिग्रस्त तो नहीं कर रहे ?  कभी कभी तो सोशल मीडिया एवं इन्टरनेट पर राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ से ये भावना मजबूत हो चली है कि आई टी एक्ट २००० की धारा ६६ A का पुनरावलोकन किया जाये / अव चाहे ये  सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर हो अथवा सरकार एवं संसद के स्तर पर /  भारतीय साइबर कानून की धारा ६७ के तहत दोषी पाए जाने पर ५ साल की सजा अथवा १० लाख रूपया का जुरमाना  करने का प्रावधान है / ये कानून भी नैतिक मानदंडों एवं उनके दुरूपयोग के खिलाफ है / साइबर कानून. के तहत राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों, किसी के जीवन अथवा पद की गरिमा के विपरीत अफवाह फैलाना अथवा किसी खबर न्यूज़ अथवा तथ्य को तोड़ मरोड़कर पेश करना अथवा उसे इरादतन एवं गैर इरादतन तरीके से फैलाना इत्यादि विभिन्न धाराओं के तहत कानूनन जुर्म है/ आज कोई भी कितना भी आईटी  का विशेषज्ञ अथवा  जानकर क्यों न हो/ आप तकनीकी गोपनीयता वाले कितने भी मापदंड ( एन्क्रिप्शन टेक्नोलॉजी यथा ६४ बिट या १२८ बिट विद एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्शन) क्यों न अपना रहे हों लेकिन कानून कानून होता है और अपराध की दुनिया कुछ न कुछ कहीं न कहीं सबूत जरूर छोड़ती है/  और यही सोशल मीडिया पर सबूत किसी के लिए दण्ड का सबब न बन जाएँ उससे पहले हमें संयमित ब्यवहार करने की आवश्यक्ता है/

आज नोट बदली से देश की राजनैतिक फिजां में एक भूचाल सा आ गया है/ जरुरी भी है क्योंकि एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र मैं विचारधाराओं की विविधताओं का होना स्वाभाविक है /  परंतु विपक्ष का मतलब ये कतई नहीं होता कि ” सरकार द्वारा घोषित किसी भी योजना स्वरूपी पेड़ जैसे नीम के पेड़ को तर्कों, कुतकों अथवा वितर्कों  के माध्यम से बबूल का पेड़ घोषित करने की हर संभव चेस्टा की जाये/ अच्छी योजनाओं की प्रशंसा कर मतभेद भुलाकर सकारात्मक विपक्ष का परिचय देना चाहिए/ बिपक्ष का मतलब ये भी नहीं होना चाहिए कि ( अभी हाल हैं व्हाट्सएप्प पर वायरल एक  विडियो के सन्दर्भ में) पहले नोट को हलके रंगीन पानी में डालो, फिर सुखाकर मीडिया को बुलाकर तौलिये पर नोट के रंग छूटने का झूठा सबूत देकर मीडिया में अफवाह फैला दो/ अतीव सर्वदा वर्जयेत – विशेष रूप से राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों के साथ ऐसा न हो तभी सोशल मीडिया के सदुपयोग की सार्थकता है/

आज राजनैतिक आरोप प्रत्यारोपों के दौर में एक अहम् बात सोचने की  ये है कि बैंक से नोट  बदली के लिए लाइन में गरीब एवं मध्यम  वर्गीय लोग परेशान हैं/ सत्य भी है एवं तथ्य भी / ये भी अफवाह है कि कोई भी अमीर व्यक्ति लाइन में नहीं लगा, शायद सरकार ने उनको लाभ देने का इंतजाम पहले से कर दिया / चलो ये तथ्य भी सत्य मालूम होता है थोड़ी देर के लिए  / परंतु यहाँ सबसे अहम् बात सोचने की ये है कि देश में कितने लोग अमीर हैं जिनको हम लाइन में देखना चाहते हैं/ क्या वे करोड़ों में हैं जो लाइन में सिर्फ वे ही दिखेंगे सूट बूट में/ क्या उनके चेहरे पर अमीरी का सरकारी अथवा गैर सरकारी स्टाम्प अथवा मुख़ौटा होगा जिससे हम उनको पहचान कर अपनी वैचारिक विश्लेषण की भाषा एवं तथ्यों को बदल लेंगे /  ये भी तो हो सकता है कि काले धन वाले अभी वक्त की फिजां का अध्ययन कर रहे हों और अपनी व्यूह रचना गढ़ने एवं लागू करने के बहुआयामी तरीकों पर विचार मंथन कर रहे हों? वो कोई आम सोच वाले नॉसिखिये इंसान तो नहीं वल्कि काली मौद्रिक दुनिया के वो मजे हुए खिलाड़ी भी तो हो सकते हैं जो अपने कर्मचारियों, कारिंदों, मित्रों, रिश्तेदारों एवं भोले भाले गरीब एवं मजदूर लोगों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए ” हिस्सा आधारित” फॉर्मूले पर करने के गोपनीय तरीके पर विचार मंथन में लगे हों/  कहते हैं कि ” दौलत जब दुनियां में आती है तो उसके चेहरे से पैदाइशी खून टपकता है परंतु दौलत से जब पूँजी का जन्म होता है तो उसके जिस्म के हर हिस्से से लहू टपकता है” / ये भी तो आज एक मंजर ए हकीकत है / शायद गरीब एवं मजदूर के हाथ / थाली से छीनीं हुयी दौलत /रोटी हो सकता है कल अपने क़ातिलाना स्वरुप को त्याग कर गरीब एवं मज़दूर के हाथ में स्वेच्छा अथवा मजबूरी में ही सही बाहर आकर बाजार में निकले और कल्याण एवं अपराध बोध की स्वीकारोक्ति के साथ गरीब मज़दूर के आँसूं पोंछते हुए ईमानदारी एवं लोक कल्याण का नवीन इतिहास लिखदे/ सरकारों को भी चाहिए कि  अपराध बोध से बाहर निकलने वालों को सकारात्मक एवं सुधारात्मक सोच के साथ उचित परंतु कल्याणकारी भावना के स्वरुप काम कर उन्हें प्रायश्चित्त करने मौका दे /

आज सोशल मीडिया पर कभी नकली नोटों की अफवाह तो कभी गोपनीयता को  भंग करने की साजिश/ जनता सब जानती है / ये सार्वभौमिक सत्य कथन है कि कोई भी नवीन योजना कुछ तो तकलीफ देगी यदि उसके दूरगामी परिणाम अच्छे हुए तो ” अंत भला तो सब भला” वर्ना सरकार को उखाड़ फैंकने के लोकतान्त्रिक हथियार यानी वोट आपके हाथ आपके साथ / कीजिये उपयोग और दिखाईये वोट की ताकत / निःसंदेह कुछ तो अच्छा सोचा होगा आम आदमी के लिए/ वर्ना आम गरीब एवं मजदूर मध्यम वर्गीय तबका तो आज भी  वर्ल्ड बैंक को सर्वे सपोर्ट देने वाली एजेंसी ” लूँइज्ज़र मॉन्स्टर बोर्ड वेज इंडेक्स ” की रिपोर्ट के अनुसार भारत में व्हाइट कॉलर नौकर पेशा  लोगों की स्तिथि एशिया मैं  चीन एवं पाकिस्तान की तुलना में सर्वोत्तम है यानी १७२ रूपया प्रति घंटे है जो की चीन की ९६ एवं पाकिस्तान की ८१ रूपया की तुलना में काफी अधिक है/ ज्ञात रहे की इसी तबके का एक हिस्सा आज सातवें वेतन आयोग के फल खाते हुये शायद ये बात क्यों भूल रहा है की गरीब एवं मजदूर के लिए कोई वेतन आयोग नहीं और सातवें वेतन आयोग के साइड इफेक्ट्स सर्वाधिक उसी के जेब  एवं पेट पर चोट कर रहे हैं/  कुछ तो सब्र रखें / एक बार इसको भी देख लें/  अभी हाल में यूनाइटेड नेशन्स एवं  इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट के अनुसार मजदूरों के लिए ७२ देशों की सूची में भारत का स्थान ६९ वाँ यानी सिर्फ तीन देश पाकिस्तान, फिलीपीन्स एवं ताजकिस्तान के मजदूर ही हमारे मजदूर समुदाय से ज्यादा गरीब हैं/  ये तबका आज भी इस आस में जी रहा है की कालाधन शायद सफ़ेद बनकर उसकी थाली को एक दिन आबाद करदे/ उसके पास अनर्गल बातों एवं स्मार्ट फ़ोन पर बवंडर फैलने का वक्त  नहीं/ आज सरकार उसके तंत्र एवं देश के जन समुदाय को संयम से काम लेने की जरुरत है / ताकि योजना को लोकहित से परे मजाक न बनना पड़े/ लोकतान्त्रिक देश के नागरिकों के लिए भी कुछ मर्यादाएं होनी चाहिए और उनका पालन  भी/


संवेदना की स्याही से ……..      

क्यों मजबूर हुआ मजदूर ? 

प्रो.(डॉ.) डी. पी. शर्माधौलपुरी“ 30/04/2016   

Published in Rajasthan Patrika on 30/04/2016 Editorial Page, 
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http://epaper.patrika.com/794129/Rajasthan-Patrika-Jaipur/30-04-2016#page/12/1

विकसित अथवा विकाशसील देश आज धरती से  अंतरिक्ष  एवम मंगल ग्रह तक अपनी छलांग लगाने के लिए आतुर हैं, इस बात से बेखबर कि आज भी हमारे आस पास लाखों ऐसे गरीब मजदूर यथा बच्चे, बृद्ध, विकलांग,महिला एवं पुरुष रह रहे हैं जिन्हें दिन भर की मजदूरी के बाद भी दो वक़्त  का भोजन भी मयस्सर नहीं होता, मानवाधिकार तो बहुत दूर की बात है उनके लिए  /

आर्थिक दृस्टि से समृद्ध लोकतान्त्रिक देशों के सभ्य समाज में आज भी मजदूर शब्द सुनते ही दिमाग में दबे कुचले, पिछड़े, गरीब एवं आर्थिक रूप से बदहाल जीवन यापन करने वाले लोगों की एक अजीब सी तस्वीर उभर कर सामने आती है / आखिर अन्याय एवम असमानता का ऐसा मंजर क्यों और कब तक ? दुनियां की प्रगति का पहिया आखिर कब तक मज़बूरी में लिपटे मजदूर के भरपेट भोजन एवं तन पर अदद कपडे  के सपनों को कुचलता रहेगा? सामाजिक सुरक्षा, न्याय एवं जीने का अधिकार तो किसी भी लोक कल्याणकारी सरकार एवं राष्ट्र का प्रथम कानूनी उद्देश्य होना चाहिए/ आज यदि हम अपने देश की बात करें तो सरकारी एवं गैर सरकारी प्रयास इस दिशा में कितने कारगर साबित हुए और देश के मजबूर मजदूर का जीवन प्रगति की राह में कितना सुधरा, हम सभी के लिए एक अति विचारणीय प्रश्न है /

सन् २०१२ के आंकड़ों के अनुसार भारत में मजदूरों की संख्या लगभग 487 मिलियन थी जिनमें ९४ प्रतिशत असंगठित क्षेत्र के मजदूर थे / भारत में मजदूरों की ये तश्वीर दुनियां में चीन के बाद दूसरा स्थान रखती है। सबसे हैरानी की बात तो ये है कि पिछले दो दशक से सत्तासीन सरकारें अनेकों योजनाएं लायी जैसे भोजन का अधिकार,  काम का अधिकार, नरेगा, एवं अन्य परन्तु हर योजना में एक बात आम थी कि मजदूरों को आर्थिक लाभ तो हुआ, उनकी जेब में कुछ सरकारी खजाने से पैसे तो पहुंचे परन्तु उन्हें स्वावलंबी बनाने एवं राष्ट्र हितोपयोगी कार्य के लिए नहीं / दिल्ली में बनी  ये योजनाएं मजदूर के गांव तक पहुँचते पहुँचते अपना कल्याणकारी स्वरूप खो बैठीं और महज सरकारी खजाने से  पैसे  के उपभोग का जरिया मात्र बनकर रह गयीं / उनकी दूरगामी समृद्धि के प्रयास सिर्फ कागजों की शोभा बन कर ही रह गए /एक रिपोर्ट के अनुसार नरेगा में जो पैसा सरकारी खजाने से गरीब या मजदूर को मिला उसके एवज में कितना काम राष्ट्र निर्माण के लिए हुआ और उसकी जमीनी हकीकत क्या है ये आज ज्वलंत सवाल इसकी सफलता के प्रमाणपत्र पर काले धब्बे के रूप में अंकित हैं ? और सरकारें वाहवाही लूटने के लिए आपस में लड़ रहीं हैं /  इसके विपरीत अभी हाल में घोषित नवीन ‘जन धन’ योजना से एक लाभ तो होने की सम्भावना है कि सरकार एवं मजदूर के बीच बिचोलिये की भूमिका जरूर काम हो जाएगी जो कि भ्रस्टाचार की सबसे बड़ी कड़ी है और सरकारी पैसा सीधे लाभार्थी के अकाउंट में पहुँच जायेगा  /

आज दुनियां दो ध्रुवीय हो चुकी है/ एक वर्ग शोषक का है तो दूसरा वर्ग शोषित का/ लोक कल्याणकारी सरकारें इनमें संतुलन स्थापित करने में शुरू से आज तक लगी हुयी हैं/ दोनों वर्गों की असंतुलित भागीदारी और यही बंटवारा अनेकों

रूपों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से विद्रोह एवं सामाजिक अथवा राष्ट्रीय अशांति का कारण बनते रहे हैं/ संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र एजेंसी “अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन” के अनुसार दुनियां में सार्वभौमिक शांति तभी स्थापित हो सकती है

जब सामाजिक न्याय की अवधारणा को सही मायने में लागू किया जाये / एक अमेरिकी शोध अध्ययन के अनुसार अभी हाल में उत्तर अफ्रीकी देशों, खाड़ी देशों में जो सिविल वार देखने को मिला उसके पीछे वो मजदूर एवं वेरोजगार थे जिनके हाथ में काम एवं पेट में अनाज नहीं था/ सरकारों एवं सत्ताशीन शासकों  ने उनको कुचलने का प्रयास किया / ऐसी क्रांति के प्रयास सफल अथवा असफल हुए ये अलग बात है परन्तु शोषक एवं शोषित समाज की खाई को और गहरा कर गए जिसके दूरगामी परिणाम सामने आना बाकी है / राजनैतिक परिवर्तन एवं  सामाजिक न्याय के लिए मिश्र , लीबिया, ट्यूनीशिया एवं अन्य देशों के वेरोजगार युवा, मजदूरों ने आंदोलन का  साथ देकर अपने ही देश एवं समाज को अशांति एवं विद्रोह की आग में झोंक दिया /

अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं भविष्य में ऐसा न हो इसलिए सामाजिक न्याय की भूमंडलीकृत अवधारणा को स्थापित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का प्राथमिक उद्देश्य मेंबर देशों जिनमें भारत भी शामिल है, युवा महिला एवं पुरुषों के लिए रोजगार के ऐसे अवसर तैयार करने में मदद करना है जो २००८ में स्थापित विशेष मानकों पूरा करते हों / बाद  में २०१० के अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन प्रस्ताव में रोजगार पॉलिसी एवं सामाजिक न्याय को फेयर भूमंडलीकरण के लिए  लागू किया गया/ अगर गहराई एवं ईमानदारी से देखें तो अभी तक किसी भी केंद्र सरकार जिसमें वर्तमान सरकार भी शामिल है, कुछ प्रयासों को छोडकर कोई भी ऐसा महत्वपूर्ण एवं ठोस कदम नहीं उठाया जिससे इन प्रस्तावों के अनुसार भारत में मजदूरों के रोजगार, कार्य सुरक्षा, बीमा, स्किल विकास एवं माइक्रो फाइनेंस जैसे मुद्दों को सही एवं प्रभावी रूप से लागू किया जा सके/ अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने २०१२ में एक प्रोग्राम की शुरुआत की थी जिसमें विकाशसील देशों जिनमें प्रमुख रूप से भारत, चीन एवं पाकिस्तान के साथ साथ अफ्रीकी देशों में ऐसे संस्थानों का अध्ययन करना शामिल था जहाँ पर मजदूरों की हालत में अंतर्राष्ट्रीय सपोर्ट के बाद भी विशेष परिवर्तन नहीं आया / मजदूर कल्याण की दिशा में वर्तमान सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर २०१४  में  “पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्रमदेव जयते ” कार्यक्रम की घोषणा की थी / इसी के साथ ” श्रम सुविधा ” नामक यूनिफाइड लेबर पोर्टल एवं प्रोविडेंड फण्ड के लिए यूनिवर्सल अकाउंट नंबर का भी उद्घाटन किया गया/ शुरुआती दौर में ऐसा लगा कि देश के चार करोड़ मजदूर “यूनिक लेबर आइडेंटिफिकेशन नंबर (लिन)” से निश्चित रूप से लाभान्वित होंगे /

आज के तकनीक क्रांति युग में सूचना तकनीकी को गरीबी  उन्मूलन के लिए  इस्तेमाल किया जा रहा है / लेकिन टेक्नोलॉजी प्रेमी प्रधानमंत्री को ये भी समझना चाहिए कि जिस मजदूर को इतनी मजदूरी नहीं मिलती हो कि वो अपना गुजारा कर पाए तब तक उसके लिए ये सारे प्रयास हाई-टेक शगूफे ही कहलाएंगे /

भाषाई लोकलाइजेशन की बात करने वाली सरकार आज भी चीन, कोरिया एवं रशिया जैसे देशों से बहुत दूर है जहाँ हर सरकारी कामकाज राष्ट्रीय भाषा में होता है / अपनी भाषा में काम करने के बावजूद ये देश कहाँ हैं और हम कहाँ? जिस “सुविधा पोर्टल ” की भाषा अंग्रेजी आज भी गुलामी की दास्ताँ सुना रही हो तब सवाल उठता है कि उस देश का गरीब एवं मजदूर कैसे एवं किस इलेकट्रॉनिक गैज़ेट से सेवा हासिल करेगा ? बेसिक शिक्षा एवं तकनीकी स्किल से दूर आज भी मजदूर पुराने परंपरागत तरीके अपना कर मजदूरी के लिए मजबूर है / सवाल उठता है कि क्या सरकार ने इन हाई-टेक सुविधाओं के उपयोग के लिए कोई ठोस आधार भूत योजना बनायी और लागू की ? शायद नहीं / सिर्फ सरकारी वेबसाइट्स पर घोषणाओं के कर्मकांडों को लटका कर लोक कल्याणकारी सरकार की परिभाषा गढ़ना विकास एवं कल्याण नहीं है/ यही अनेकानेक घोषणाएं समस्यांओं का मजमा बनकर विकास के मार्ग अवरुद्ध कर रहीं  हैं/ याद रहे कि  तकनीक देना उतना जरूरी नहीं जितना कि उसके उपयोग को सुनिश्चित करना एवं उससे जुडी आधारभूत शिक्षा, प्रशिक्षण का प्रचार एवं प्रसार करना वर्ना ये तकनीकें सफ़ेद हाथी सावित होंगे भारत जैसे विकासशील देश के लिए / मजदूर को आज वेबसाइट, सूचना तकनीकी एवं सरकारी कार्ड की जरुरत तो है परन्तु क्या मजदूर एवं उसके कार्य को सरल सुगम बनाने एवं सुरक्षित करने वाली तकनीक पर भी कोई योजना बनायी गयी? ऐसे कितने मजदूर हैं भारत में जो कार्य स्थल पर सुरक्षा कवच यानी हेलमेट, विशेष उपकरण एवं सिग्नल सूचक यंत्रों का इस्तेमाल करते हैं एवं सरकारें इसके लिए उपयुक्त कानून के माध्यम से मजदूर नियोजकों को वाध्य करती हैं ?

हाई-टेक होते सरकार एवं सरकारी दफ्तरों, अफसरों के चैम्बर्स एवं कंपनियों के कार्यालयों की चमक दमक से परे आज गरीब मजदूर की सुरक्षा एवं मूलभूत सुविधा का ख्याल कब रखा जायेगा, कानून कब बनाए जायेंगे और उनको शख्ती से लागू कब किया जायेगा /

आज भोजन का अधिकार कानून तो है लेकिन फिर भी वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार सैकड़ों लोग भारत में भूख से क्यों मर जाते हैं ? आज संवेदनशीलता का आलम ये है कि अगर कोई गरीब किसान मजदूर भूख से मर भी जाये तो उसके लिए जांच समिति बना दी जाती है / जिसकी विसरा रिपोर्ट दस साल बाद इस बात का खुलासा करती है कि अमुक किसान मजदूर भूख से नहीं मरा क्योंकि उसकी पेट के  धोबन की लेबोरेटरी जाँच में अनाज के लक्षण पाये गए हैं/ क्या यही हैं मजदूर कल्याण ?

वर्ल्ड रिपोर्ट के अनुसार हम मुगालते में हैं कि सन २०२० तक विश्व को अधिकाधिक लेबर की जरूरतें हिंदुस्तान पूरी करेगा / क्या हम भारत को कृषि आधारित देश से बदलकर मजदूर आधारित देश बनाना चाहते हैं ? बैसे ठीक भी है क्योंकि आज हजारों इंजीनियरिंग कॉलेजेस, डिप्लोमा कॉलेजेस सिर्फ दिखावटी लेबर ही तो पैदा कर रहे हैं ; स्किल्ड इंजीनियर या तकनीशियन नहीं / नास्कॉम की ताजा रिपोर्ट चौंकाने वाली ही नहीं वल्कि हमें हकीकत का आयना दिखाने वाली है कि कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे ये तकनीकी संस्थान बेरोजगार अर्द्ध स्किल्ड लेबर पैदा करने वाली फैक्टरियाँ  हीं तो हैं /

तकनीक से ही दुनियां को प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाया जा सकता है / परन्तु  वर्ल्ड बैंक के नवीन आंकड़ों के अनुसार केवल ५३ प्रतिशत ही भारतीय युवक बैंक खाता धारी हैं जो कि चीन की ७९ प्रतिशत की तुलना में काफी कम है/ इस सन्दर्भ में सरकार की “जन धन” योजना लाखों नागरिकों जिनमें मजदूर एवं बेरोजगार भी शामिल हैं के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है /

भारतीय अर्थ व्यबस्था को “रेडिकल ट्रांसफॉर्मेशन” की तरफ ले जाने वाली सरकार ये क्यों भूल रही है कि उसे विरासत में ऐसी जमीन मिली है जहाँ २००४ से २०१४ तक आर्थिक सुधारों के बजाय नयी नयी कल्याणकारी योजनाओं को पैदा कर उनके गीत गाने के कार्यक्रम तो हुए जैसे रोजगार का अधिकार, भोजन का अधिकार एवम शिक्षा का अधिकार बगेरा बगेरा / एक सिद्धांत के अनुसार योजनाएं कभी भी ख़राब नहीं होतीं क्योंकि वे कल्याण के बनाई जाती हैं / सिर्फ अच्छा एवं बुरा स्वरूप उनको लागू करने वालों एवं लाभ लेने वालों की नीयत पर निर्भर करता है / कहते हैं कि “दौलत जब दुनियां में आती है तो उसके चेहरे से पैदायशी खून टपकता है और जब दौलत से पूंजी का जन्म होता है तो उसके जिश्म के हर हिस्से से लहू टपकता है”/ पूंजीवादी लोग आज यही तो नहीं कर रहे ? किस तरह कानून का फायदा उठाते हैं ये लोग अभी हाल में भारत में देखने को मिला / भारत सरकार ने २०१५ में चाइल्ड लेबर ( प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन ) सुधार विधेयक २०१२ को पारित किया/ इस कानून के अनुसार स्कूल टाइम के आलावा १४ साल से १८ साल के बच्चों को पारिवारिक व्यवसाय में छूट देने का प्रावधान किया  गया / कानून को तोड़कर राश्ता निकालने के पेशेबर लोगों ने इसमें भी रास्ते  निकाल लिए / आज भी जयपुर जैसे राजधानी क्षेत्र में बाल मजदूरी बड़ी समस्या बनी हुयी है / देश के एक पेशेबर वकील की संवेदनहीनता देखिये कि उसने मुवक्किल को बचाने के लिए पटाखा, मांजा बनाने वाले व्यवसाय को अपने तर्कों से गैर नुकसानदेह धंधा साबित कर दिया/

अभी हाल में वर्तमान सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहाकार अरविन्द सुब्रमण्यम जो कि अंतर्राष्ट्रीय फंड्स के इकोनॉमिस्ट रहे हैं ने नया जुमला सरकार को दिया है ” इंक्रेमेंटलिस्म” / उनके अनुसार देश में बिज़नेस बढ़ाने एवम इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करने के लिए लेबर कानून को सरल करने की आवश्यक्ता है / उनकी सोच एवं जनकोव् व रमल्हो की अध्ययन रिपोर्ट जिनमें भारत भी शामिल है, इस बात का समर्थन करती है कि कठोर रोजगार कानून के कारण देश में असंगठित क्षेत्र बढ़ा है और जिससे बेरोजगारी बड़ी है / रिपोर्ट में कहा गया है कि  कठोर श्रम कानून के कारण भी देश में प्रति व्यक्ति आय कमजोर हुयी है/ इन हालातों में सवाल उठता है कि देश के बड़े बड़े सलाहकार क्या जमीनी हकीकत के अनुसार कोई सफल प्रयोग कर पाएंगे जिससे देश का गरीब मजदूर बेरोजगार आर्थिक सुधारों का लाभ लेकर प्रगति की राह में आगे बढ़ पाएगा या फिर पुरानी योजनाएं नए पैक में साबित होगी/ आज गहन सोच एवं मंथन के बाद योजनाएं बनाने एवं उनकी क्रियान्विति सुनिश्चित करने की  आवश्यकता है न कि रोज नित नयी घोषणाओं के कर्मकांड की /


बारूद की कलम से …………

बापू हम शर्मिंदा हैं, “देश के स्वतंत्रता संग्राम से भी बढ़कर है ये क्रिकेट की जंग”

 प्रो.(डॉ.) डी. पी. शर्मा “ धौलपुरी“ 23/03/2013

देश का नैतिक चरित्र आज अधपतन के मार्ग से फिसलते हुए एक ऐसी दलदल में जा फंसा है जहाँ दबे-दबे पनपते रहे महारोग राष्ट्रीय चरित्र की सम्पूर्ण काया को संदिग्ध रूप से सड़ांध में परिवर्तित करते रहे हैं/ आखिर कब तक?

कृतज्ञ राष्ट्र के वाशिंदे “बापू हम शर्मिंदा हैं “

राष्ट्रपिता आपको अपमानित करके हमने आपके त्याग और बलिदान को व्यापार के धरातल पर बेच दिया है / यूँ तो कहते हैं कि एक ठगों का भी अपना ईमान होता है, परन्तु हमने तो व्यापारिक अड्डे पर आपकी की शहादत को ‘क्रिकेट के तथाकथित नटवरलालों’ से तुलना करके ऐसा कृत्य किया है जिससे आपकी आत्मा शायद ही हमें माफ़ कर सके / परन्तु फिर भी हमने ये कृत्य यह सोच कर अंजाम तक पहुँचाया है कि “ हे राम इन्हें माफ़ करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं”

व्यापार क़ी अशीमित भूख एवं निर्लज्ज महत्वाकांछाओं के भंवर में पड़कर व्यापार के अतिउत्साही लोग अपनी चरित्रवान माँ (मात्रभूमि एवं राष्ट्रपिता) क़ी तुलना नटवरलालों (क्रिकेट रूपी व्यापार के खिलाड़ी) से कर व्यापारिक पुण्य का काम कर रहे हैं, ताकि थोथी लोकप्रियता, मानसिक दिवालिया हो चुके लोगों तक पहुंचाई जा सके /

अंतर्राष्ट्रीय जुए का पार्याय कहे जाने वाले क्रिकेट के तथाकथित महानतम खिलाड़ी को हमने महात्मा गाँधी जी से भी अधिक महान घोषित कर दिया है, और हो भी क्यों न, सचिन तेंदुलकर ने उसी क्रिकेट का तथाकथित महानतम नायक बनने का गौरव हासिल किया है जो कभी हमारी गुलाम माँ का चीर हरण करने वालों का पसंदीदा खेल हुआ करता था? जलालत के दंश को झेल रहा सम्पूर्ण राष्ट्र इस मूकदर्शक तमाशे को देखकर सुख और दुःख के झंझावातों में जूझकर भी आज असहाय महसूस कर रहा है /

विशुद्ध व्यापारिक प्रतिष्पर्र्धा के धरातल पर खेले जाने वाले जुए एवं तथाकथित महानतम जुआरी , जिसका देश के लिए त्याग नगण्य ही नहीं वल्कि शून्य है, क़ी तुलना हम यदि एक ऐसे महापुरुष से करें जो देश के लिए भूखा रहा, नंगे पैर अर्ध वस्त्रों में दर दर जनता क़ी पीड़ा तो टटोलता, भागता रहा, कालजयी शारीरिक , मानसिक प्रताड्नाओं को इसलिए झेलता रहा कि आने वाला कल भारत के लिए एक नये सूरज के साथ नवीन आशाओं का ऐसा संसार लेकर आयेगा जिसमें नवीन आशाएं होंगी , नैतिकता और त्याग के साथ साथ मात्रभूमि क़ी खुशाली के लिए/ परन्तु अफ़सोस भ्रस्टाचार , अनैतिकता, अनाचार क़ी दल दल में धन्श्ता जा रहा भारत मानसिक दिवालिये पन क़ी ऐसी तस्वीर पेश करेगा ऐसा किसी ने भी नहीं सोचा होगा/…..

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“भ्रस्टाचार की दलदल में! क्रिकेट के महाशतक का नंगनाच “ बापू हम शर्मिंदा हैं, प्रो. (डॉ.) डी. पी. शर्मा “धौलपुरी“

आज फिर एक और तमाशा जिसमें पूरा देश पगलाया हुआ है कि आखिर शतकों का शतक कब लगेगा ? हद हो गयी / क्यों प्रतिद्वंद्वी क्रिकेट टीम सचिन तेंदुलकर को दया मौका देकर शतक बनवा देती, कमसे कम इस घटिया पसमंजर का अंत तो हो जायेगा / कैसा हास्यास्पद लगता है कि बुढ़ापे मैं भी सन्यास लेने की इच्छा नहीं है, और तिस पर तेंदुलकर जी यह कह रहे हैं उनका मकसद शतक नहीं वल्कि वो अपनी क्रिकेट पर ध्यान दे रहे हैं? कैसा हास्यास्पद बयान है जिसे मीडिया (भाड़े का) सुर्खियाँ बनाकर छाप रहा है / छापे भी क्यों नहीं पैसे जो लिए हैं / विज्ञापन के कमीशन का हिस्सा सबको मिलना चाहिए क्योंकि सचिन को भगवान बनाने मैं उनका भी तो योगदान है वर्ना हर कोई ऐरा गैरा धतूरा, भगवान नहीं बन जाता? ज्ञात रहे कि क्रिकेट मैं सचिन का पूरा एक मीडिया मैनेजमेंट टीम काम कर रहा है, जिसमें घटिया खेल के प्रदर्शन मैं से भी कुछ तुरुप निकालो और सचिन की तारीफी मैं कुछ न कुछ लिखो / कैसा तमाशा हो रहा है? और भारत का कमजोर मानस इस ” जुए बाजी ” खेल को समझ नहीं पा रहा / विश्व कप मैं जब सचिन महोदय २ रन पर आउट हुए तो मीडिया ने एक चापलूस भांड की तरह लिखा ” खेल भावना कोई सचिन तेंदुलकर से सीखे, आउट होते ही चले गया बिना कुछ बोले”, ये भी कोई बात हुई? वापिस पवेलियन नहीं जाते तो क्या मैदान मैं भांगड़ा करते? अतिरंजित चापलूसी की भी कोई हद होती है / यहाँ सुझाव के तौर पर ये कहा जा सकता है कि मीडिया को अपनी गरिमा का ख्याल करना चाहिए / कलम का स्वाभिमान होता है / इसे इस तरह नहीं बिकना चाहिए / क्या योगदान था सचिन का विश्व कप मैं जो सारे खिलाडी पगलाते हुए बोल रहे थे ये विश्व कप, सचिन को समर्पित है? क्यों, क्या वो देश से ऊपर हैं / आखिर गुलामी की मानसिकता को हम कब त्यागेंगे?

सचिन की लोकप्रियता गिरते ही सेकड़ों नेताओं , जो कि एक विशेष राज्य से सम्बन्ध रखते हैं एवं पत्रकारों का चूल्हा बंद हो जायेगा , क्यों कि सचिन को जो भी विज्ञापन का पैसा मिलता है, उसका एक फिक्स हिस्सा मीडिया के भांडों ( कुछ के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए) एवं राजनीत के परम शिखंडियों ( सबके लिए नहीं ) को जाता है/ अगर आपकी समझ से परे है तो हम आपको बताते हैं कि , संसद का मंच जहाँ देश के कल्याण के कानून बनाये जाते हैं , सचिन का शतक लगते ही कार्यवाही रोक कर लोग संसद के गरिमा पूर्ण पटल पर हंसी मजाक करते हुए , सारे काम रोक कर भारतीय टीम को बधाई देते हैं / आखिर क्यों? ऐसा हमने विश्व के किसी देश मैं न देखा न ही सुना / जब देश का वीर सिपाही सीमा पर देश क़ी हिफाजत के लिए शहीद होता है तो हम कभी भी संसद क़ी कार्यवाही रोककर उसको श्रद्धांजलि नहीं देते अथवा उसकी वीरगाथा का यशोगान नहीं करते, क्यों? क्योंकि वो राजनीति के इन परम शिखंडियों को कोई कमीशन नहीं देता / क्रिकेट, सचिन एवं राजनीति के दिग्गजों का एक ऐसा रिश्ता है जो आम लोगों क़ी समझ से परे है /

अभी हाल मैं थल सेना अध्यक्ष क़ी उम्र को लेकर बवाल हो रहा है / देश क़ी आबरू के लिए लड़ने वालों को इस कदर रुशवा करने के लिए हमारी केंद्र सरकार उतारू है / क्यों? क्या उनके योगदान को इस कदर भुला दिया जायेगा? सेवानिब्रत्ति क़ी उम्र को लेकर इतना विवाद क्यों? जबकि क्रिकेट मैं मीडिया लिखता है “सचिन अपनी मर्जी के मालिक हैं, वो किस मैच मैं खेलेंगे किसमें नहीं वे खुद निर्णय करते है, क्यों? अभी हाल मैं एक अख़बार ने लिखा कि सचिन के महाशतक के लिए कोई भी वरिष्ठ खिलाड़ी बलिदान देने के लिए तैयार है , ये तो ऐसा जुमला लगता है कि ‘ राहुल गाँधी ‘ के लिए कोई भी वरिष्ठ कांग्रेसी अपनी सीट का वलिदान देने के लिए तैयार है / किसी भी खिलाड़ी से पूछे बगैर मीडिया ( भाड़े का ) ने ऐसा कैसे लिख दिया?, इसका जवाब भी मीडिया को ही देना चाहिए / क्या भारतीय क्रिकेट किसी क़ी वन्सानुगत जागीर है ? इतनी गुलामी किस लिए? फिर इतनी गुलामी भारतीय सेना के मामले मैं क्यों नहीं? क्यों थल सेना अध्यक्ष को कहा जाता क़ी क़ी आपकी सेवा एवं देश के प्रति निष्ठा को ध्यान मैं रखते हुए हम आपके विवेक पर छोड़ते हैं, आपका हर निर्णय सरकार नैतिकता के धरातल पर मान लेगी / कर के तो देखते सच मानिये वे स्वयं स्तीफा देकर चले जाते लेकिन हमें तो जिद है, उनका अपमान करने क़ी, जो देश के लिए कुर्वानी देना चाहते हैं….

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क्रिकेट विश्व कप २०११ सेमी फ़ाइनल फिक्स था…..आई .सी. सी. ने शुरू क़ी जाँच (Sunday Times England) क्रिकेट विश्व कप २०११ फ़ाइनल भी फिक्स था…..इसके पुख्ता सबूत, बापू हम शर्मिंदा हैं, प्रो. (डॉ.) डी. पी. शर्मा “धौलपुरी“

 

 

 

 हम शर्मिंदा हैं, क्रिकेट विश्व कप २०११ सेमी फ़ाइनल फिक्स था?         

…..आई .सी. सी. ने शुरू क़ी जाँच (Sunday Times England), क्रिकेट विश्व कप क्रिकेट विश्व कप २०११ सेमी फ़ाइनल फिक्स था…२०११ फ़ाइनल भी फिक्स था…इसके पुख्ता सबूत?

आज फिर एक रहस्य से पर्दा उठने को है / आखिर क्रिकेट भगवान को विश्व कप सेमी फ़ाइनल २०११ में ७ बार पाकिस्तानी खिलाडियों ने जीवन दान क्यों दिया? क्रिकेट में सब कुछ फिक्स है / खेल भावना के साथ खिलवाड़ का ऐसा मंजर इतिहास में पहले कभी नहीं देखा होगा आपने / खेल यानी सिर्फ पैसा, मदिरा एवं हशीनाओं के शौक तक सिमट कर रह गया है (एक राष्ट्रीय अख़बार की रिपोर्ट) / आई. सी. सी क़ी नींद अब शायद खुल चुकी है परन्तु मजबूरी की दलदल में / यहाँ में स्पष्ठ करना चाहता हूँ कि विश्व कप २०११ का फ़ाइनल भी फिक्स था? एक अख़बार की रिपोर्ट” तंगी में खेल रहे हैं श्रीलंकाई चीते, बकाया हैं 50 लाख डॉलर/ ये रिपोर्ट स्पष्ठ करती है कि श्रीलंकन क्रिकेट बोर्ड उनके खिलाडियों का भुगतान करने में कितना मजबूर है, क्यों कि उनके देश क़ी आर्थिक हालत कैसी है, ये किसी से छुपा नहीं है, सब जानते हैं? सूत्रों के अनुसार उनको विश्व कप हारने के लिए इतना पैसा मिला कि उनकी सरकार, समाज और कंपनियां सब मिलकर १० साल में भी आधा भुगतान नहीं कर सकते थे / भारतीय क्रिकेट कण्ट्रोल बोर्ड को सिर्फ विश्व कप का ठप्पा चाहिए था / बाकी सारा खेल विज्ञापन से कमाने का जुगाड़ था उनके पास/ उक्त खबर एक प्रमुख राष्ट्रीय अख़बार क़ी है जो इस बात को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है /

(तंगी में खेल रहे हैं श्रीलंकाई चीते, बकाया हैं 50 लाख डॉलर, लेकिन….. “” (मेलबॉर्न. श्रीलंका क्रिकेट की आर्थिक तंगी के कारण श्रीलंकाई खिलाड़ियों को भारत और ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ आगामी एकदिवसीय त्निकोणीय सीरीज में भी बिना भुगतान के खेलना पड़ेगा। श्रीलंकाई बोर्ड ने खिलाड़ियों को पिछले कई महीनों से उनका पूरा भुगतान नहीं किया है और आगामी सीरीज में भी स्थिति के बहुत सुधरने की संभावना नहीं है। श्रीलंकाई खिलाड़ियों को विश्व कप के बाद करीब 50 लाख डालर का भुगतान किया जाना है। फेडरेशन आफ इंटरनेशनल क्रिकेटर एसोसिएशन ने कहा है कि एसएलसी की आर्थिक स्थिति इस समय इतनी कमजोर है कि सरकार से किसी सहायता पैकेज के बिना यह काफी गंभीर हो सकती है। गौरतलब है कि खिलाड़ियों को भुगतान संबंधी मामले में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद तक को हस्तक्षेप करना पड़ा था जिसके बाद कहीं जाकर खिलाड़ियों को 20 लाख डॉलर का भुगतान किया गया था। श्रीलंकाई खिलाड़ियों को अब भी विश्व कप के दौरान दिए जाने वाले 23 लाख डॉलर के अलावा इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेले जाने वाले मैंचों की फीस का भुगतान किया जाना बाकी है। श्रीलंका टीम के कप्तान माहेला जयवर्धने ने हालांकि उम्मीद जताई है कि टीम को उनकी बकाया राशि का जल्द ही भुगतान कर दिया जाएगा। त्निकोणीय सीरीज से पूर्व गत रविवार को जयवर्धने ने कहा था कि कई खिलाडी आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और इसलिए जरूरी है कि सभी को समय पर भुगतान कर दिया जाए ताकि वह अपने खेल पर ध्यान केंद्रित कर सकें। फीका के मुख्य कार्यकारी टिम मे ने भी कहा है कि अगर एसएलसी की स्थिति में सुधार नहीं आता है तो इसका देश में क्रिकेट की स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।) “”

उपरोक्त समाचार के बाद अब आप स्वयं सोचिये कि विश्व कप फ़ाइनल २०११ में श्रीलंका ने शुरु में ये दिखा दिया था कि वे विश्व कप चैम्पियन बनने का माद्दा रखते हैं / भारतीय टीम लड़खड़ा चुकी थी / क्रिकेट के भगवान , श्रीमान जी को दुर्गति का पायजामा पहना कर श्रीलंकन टाइगर्स ने अपनी सही जगह भेज दिया था/ लेकिन अचानक उनको याद आया कि गरीबी बहुत बुरी चीज है / पेट क़ी आग कुछ भी करवा सकती है / फिर क्या था पूर्व नियोजित वादा निभाया और कप भारत क़ी झोली में डाल दिया / सबको ऐसा लग रहा था कि भारतीय शेर , श्रीलंकन चीतों को धूल धूषरित कर चुके हैं / परन्तु परदे के पीछे का खेल कुछ और था जिसका खुलासा अभी होना बाकी है परन्तु कब ये बक्त बताएगा / में जानता हूँ कि ये बहुत ही मुश्किल काम है क्योंकि पैसे से ये मुम्बईया खेल कुछ भी करा सकता है /

अब देख लीजिये, एक साल तक दुर्गति कराते रहे क्रिकेट के भगवन को कंपनियों ने अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाये रखा और आज भी कंपनियों ने अपना ब्रांड एम्बेसडर बना रखा है, आखिर क्यूँ? फर्जी मीडिया सर्वे , फर्जी मीडिया लोकप्रियता खिलाडियों को आशमान पर बिठाये रखती है / में स्वयं गवाह हूँ कि मैंने कई अख़बारों के ऑन लाइन सर्वे में अपने विचार भेजे जो कि एक अमुक खिलाड़ी के खिलाफ थे / मेरी राय को कंप्यूटर के सर्वर ने रिजेक्ट कर दिया / इसके तुरंत बाद जब मैंने उसी आई डी से खिलाडी के फेवर में विचार लिखा तो सर्वर ने तुरंत स्वीकार कर लिया/ इस तरह के फर्जी सर्वे से देश क़ी भोली जनता को बेवकूफ बनाना कितना जायज एवं नैतिक है इस पर विचार करने क़ी जरुरत है आज  वर्ना सच्चाई एवं विश्वसनीयता ऐतिहासिक आत्म हत्या करके सदा सदा के लिए विलुप्त हो जाएगी  / मीडिया के सर्वे का मजाक ऐसा कि सारे सवाल तोड़ मरोड़ कर एक खिलाडी के फेवर में /

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान इमरान खान का ये कहना अत्यंत ही प्रासंगिक था कि ” क्रिकेट के प्रायोजित भगवान 100वें शतक को लेकर परेशान थे / उन्होंने कहा कि क्रिकेट के प्रायोजित भगवान को वर्ल्डकप के बाद ही क्रिकेट से संन्यास ले लेना चाहिए था। अब वो फिजूल ही अपनी दुर्गति करवाते रहे । “हम सब चाहते हैं कि हमारा करियर धमाके के साथ खत्म हो, लेकिन हर काम योजना के तहत ही हो यह जरूरी नहीं है। उक्त भगवान के लिए वर्ल्डकप जीत एक बेहतरीन अवसर था अपने स्वर्णिम करियर को अलविदा कहने के लिए। विश्वकप में उनका प्रदर्शन बुरा नहीं था, लेकिन उनको जिद थी कि रनों के धुंए के साथ अलविदा कहें / लेकिन बक्त थोड़ा बदल गया था और मैच फिक्सिंग पर शख्ती के कारण कुछ मैनेज हो नहीं पाया जैसा पहले हो जाया करता था  कुछ आपसी समझ से, शायद आप समझ गए होंगे / वो एक महान खिलाड़ी हैं,” इमरान खान ने कहा। क्रिकेट के भगवान  के १००वें शतक पर इमरान खान का कहना था कि उनको टीम की बेहतरी के बारे में पहले सोचना चाहिए वजाय खुद के । रिकॉर्ड खेल के साथ-साथ बनते हैं। आप रिकॉर्ड बनाने के लिए नहीं खेलते। ” लेकिन इस भगवान को तो पैसे और प्रसिद्धि  का भूत सवार था , राष्ट्रीय भावना एवं सम्मान उनके लिए क्या मायने रखता  क्योंकि इन्हीं भगवान ने तो खुद को राष्ट्र पिता बापू जी से भी प्रायोजित तरीके से  खुद को बड़ा एम्बेसडर घोषित करवा दिया था, निर्लज्जता की हदें पर करते हुए/

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान को अभी हाल मैं ख़राब प्रदर्शन के कारण क्रिकेट टीम से  हटा दिया, जबकि उनका रिकॉर्ड भी इस भगवान क़ी तरह धमाकेदार रहा था/ साथ ही वे वर्ल्ड कप विजेता भी रहे हैं / लेकिन ऐसा इसलिए हुआ कि वे एवं उनकी टीम देश के लिए खेलती है / हमारे धतुरा ब्रांड खिलाड़ी पैसे, विज्ञापन, अनैतिक राजनीति एवं स्वयं के लिए खेलते हैं/ उस समय हमारी देश भक्ति कितनी शर्मशार हुई थी जब खिलाडियों ने कहा था कि यदि भारत वर्ल्ड कप जीतता है तो वह कप क्रिकेट के इस तथा कथित भगवान को समर्पित होगा /अगर इन भगवान में थोड़ी भी राष्ट्रीय भावना होती तो वे स्वयं बड़प्पन दिखाते हुए कहते कि यदि इंडिया विश्व कप जीतती है तो ये कप भारत देश को समर्पित किया जायेगा; मुझे नहीं , क्योंकि मेरा वजूद भारत देश से है न कि राष्ट्र का वजूद मुझ से / लेकिन पैसे के मद में डूबे लोगों को देश कहाँ दिखता है / इसका मतलब तो यह हुआ कि अमुक भगवान देश से ऊपर हैं और देश से अलग हैं शायद देश के भी भगवान / हों भी क्यों नहीं वो तो भगवान हैं वो भारत जैसे कई देश चुटकियों में बना सकते हैं/ ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान इयान चैपल का कहना था की , क्रिकेट के इस भारतीय भगवन को आत्म – निरीक्षण करने की जरूरत है। ऑस्ट्रेलिया अखबार द टेलिग्राफ ने चैपल के हवाले से लिखा, “ क्रिकेट के भगवन अपने अंतिम ऑस्ट्रेलिया दौरे को यादगार बना सकते थे। लेकिन वे भगवन के चोले में सिर्फ निराशा में डूबकर रह गए।” चैपल ने कहा, उनको यह सोचने की जरूरत है कि वो अब किस लक्ष्य के साथ क्रिकेट खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये भारतीय क्रिकेट के भगवन अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहरा रहे हैं। यह सन्दर्भ इसलिए उल्लेखनीय है कि ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे में रन आउट होने के बाद सचिन ने ब्रेटली द्वारा रास्ता रोके जाने को जिम्मेदार ठहराया था जो उनकी हताशा एवं एवं आपसी समझ से सहयोग की असफलता को दर्शाता  है  शायद मेरे भाव को आप समझ गए होन्गे । इस क्रिकेट के भगवन ने ऑस्ट्रेलिया दौरे पर खेले सात वनडे मुकाबलों में 20.42 की औसत से 143 रन बनाए। इसमें एक भी अर्धशतक नहीं था। उनका यह प्रदर्शन उनके करियर औसत से बहुत कम है। उन्होंने अबतक 460 वनडे मैच खेले हैं, जिसमें उन्होंने 48 शतक व 95 अर्धशतकों समेत 44.74 की औसत से 18254 रन बनाए हैं। परन्तु उस समय ऐसा लगता था  कि सब कुछ बेईमानी पूर्ण था/

उस बक्त एक चापलूस अख़बार ने लिखा —–” पाकिस्तान ने किया कमाल, तब जाकर रैंकिंग में चमके क्रिकेट के भगवन”

पाकिस्तान की इंग्लैंड के खिलाफ 3-0 की ऐतिहासिक क्लीन स्वीप का फायदा भारत के इस क्रिकेट के भगवान को आईसीसी की उस बक्त की टेस्ट रैंकिंग में मिला और वह फिर से टॉप टेन बल्लेबाजों में लौट आए। परंतु ये भगवान ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भारत की 0-4 की पराजय के बाद टॉप टेन से बाहर होकर 13वें स्थान पर पहुंच गए थे। लेकिन पाकिस्तान के इंग्लैंड को 3-0 से हराने के बाद वे टेस्ट रैंकिंग में संयुक्त रूप से दसवें स्थान पर पहुंच गए । उनके साथ पाकिस्तान के अजहर अली भी इस स्थान पर मौजूद थे लेकिन उनका मीडिया प्रबंधन ठीक नहीं था इसलिए गुमनाम रहे ।

इस खबर से आपको स्वयं अनुमान लगाना चाहिए कि हमारी रेंकिंग हमारे खेल प्रदर्शन से नहीं चमकती वल्कि इस बात से चमकती है कि कमजोर लोग कितना घटिया खेलते हैं? लिखने वालों की दिमागीय दक्षता एवं इसके पीछे की मुद्रा देखिये कि दुर्गति में भी चापलूसी का तुर्रा निकालकर छापने में कोई गुरेज नहीं /

राहुल द्रविड़ ने सम्मान के साथ क्रिकेट को अलविदा कहा/ उसके बाद खबर आई कि ये तथाकथित भगवान एवं लक्ष्मण भी क्रिकेट को अलविदा करने वाले थे जिसमें भगवान महाशतक के तुरंत बाद संन्यास ले लेंगे को प्रमुखता दी गयी/ लेकिन उस समय हद हो गयी जब मीडिया से दूर रहकर अपने बदतर खेल प्रदर्शन एवं सन्यास के सवालों से दूर रहने वाले भगवान, तुरत-फुरत मीडिया के सामने आ गए और इस बात का खंडन कर दिया कि वे सन्यास लेने वाले नहीं हैं (एक प्रमुख अख़बार क़ी खबर)? आखिर क्यों, किसलिए? इस घटिया प्रदर्शन के बावजूद आप चिपके रहना क्यों चाहते हैं? इसकी सबसे बड़ी वजह है, पैसा जो उन लोगों को भी चाहिए जिनके पास खेल के दौरान शब्दों की बकर बकर की बाजीगरी एवं खिलाडियों को इधर उधर करने के जिम्मेदार निभानी होती है /  इसके अलावा क्रिकेट में घुसे भारतीय राजनीति के  शकुनियों को भी कुछ चाहिए और ये पैसा सिर्फ भगवन ही दे सकते हैं  / एक दिवसीय क्रिकेट में इन भगवान जी क़ी रेंकिंग जमीन पर आ चुकी थी लेकिन अनैतिक हथकंडों से क्रिकेट एवं विज्ञापन क़ी दुनियां में चिपके रहने का हर संभव हथकंडा अपनाने से वाज नहीं आये ये भगवन और आखिर वो रत्न भी ले उड़े जिसका सच्चा हक़दार कोई और था / वाह  रे मेरे देश और मेरे देश की मानसिकता; में तो धन्य हो गया इस क्रिकेट के मंदिर में जहाँ भगवान चरणामृत की जगह कोकाकोला पीकर मस्त हो रहे हैं /

इन भगवान जी के ख़राब प्रदर्शन पर जब सारे पूर्व खिलाडियों ने चिल्ल पों क़ी और मीडिया को भी मज़बूरी में आलोचना को बड़े सधे हुए ढंग से छापना पड़ा तो तुरंत भगवान क़ी मीडिया टीम एक्टिव हो गयी और मीडिया एवं खिलाडियों को फिक्स करने का ऑपरेशन चरम पर पहुँच गया/ और फिर क्या हुआ तुरत-फुरत मीडिया क़ी कलम क़ी भाषा ही बदल गयी और लिख मारा” क्रिकेट इस भगवान में अभी बहुत क्रिकेट बाकी हैं”

वाह; क्या मजाक है? ये खबर पढ़कर आपको हंसीं नहीं तरस आयेगा कि इस भगवान एवं उनके चापलूस कलम के कारिंदों पर कि ” एडिलेड- अपने महाशतक का इंतजार कर रहे क्रिकेट के भगवान एडिलेड टेस्ट में दिल खोलकर शॉट खेलेंगे। वे अतिरिक्त सावधानी और रक्षात्मक खेल को छोड़कर स्ट्रोक लगाएंगे। ”   हा हा हा / टीम इंडिया के सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि इन भगवान ने चौथे टेस्ट मैच में ‘टॉप गियर’ में बल्लेबाजी करने का फैसला किया है। टीम के सदस्य ने कहा, ‘वे इतने ज़्यादा उत्साहित हैं कि वह बस एक शतक से नहीं रुकेंगे———। एक बार अगर उन्होंने यह दहलीज पार कर ली तो वे लंबी पारी खेलेंगे…आप शायद दोहरे शतक का भी उम्मीद लगा सकते हैं—–शायद हो सकता है पचास चालीस बना दें–भगवन हैं ना ।”

हे भगवान अगर तू कहीं है तो तेरी सत्ता खतरे में है / चापलूसी का ऐसा महा नंग-नाच, शायद अलौकिक, ब्रह्मांडीय, ऐतिहासिक है / और फिर इस मैच में क्या हुआ? अगर में स्वयं लिखूंगा तो हो सकता है मुझे दिल का दौरा पड़ जाये / इसलिए आप स्वयं क्रिकेट महाकाव्य में पढ़ लें तो ज्यादा ठीक होगा कि उनकी क्या दुर्गति हुई /

उस बक्त सारा क्रिकेट प्रेमी समुदाय इस बहस में उलझा हुआ था कि आखिर महाशतक कब बनेगा? जैसे कि इसके बनते ही भारत कि गरीबी छू-मंतर हो जाएगी और क्रिकेट प्रेमियों क़ी सारी मनोकामनाएं क्रिकेट का भगवान पूरी कर देगा/ लोग इस बहस में उल्झे हुए थे कि १२ मार्च २०११ के दिन क्रिकेट के भगवान साउथ अफ्रीका के खिलाफ ९९ वां शतक पूरा कर लेंगे / और एक साल पूरा हो गया ‘ बैड लक बैड लक” खेलते हुए परंतु महाशतक नहीं लग रहा / सारा क्रिकेट जगत मायूस था क्रिकेट के भगवान की इस दुर्दशा से / ” रामायण मैं लिखा है कि होनी को कौन टाल सकता है? भाग्य को कौन बदल सकता है? होईये सो वही जो राम (नहीं क्रिकेट के भगवन) रचि राखा”

भाग्य को कौन बदल सकता है तो, फिर ये तथाकथित भगवन कैसे बदल सकते हैं? वो भगवान हैं तो क्या हुआ? लेकिन यहाँ अहम् सवाल यह है कि यदि ‘गुड लक’ में शतक लग गया तो भाग्य ठीक हो जाता है, फार्म भी लोट आई मान ली जाती है और यदि फिसड्डी रह जाओ तो ‘बेड लक’ हो जाता है और फार्म बापिस चली गयी मान ली जाती है / जब सारा खेल ‘गुड लक’ और ‘बेड लक’ एवं अच्छी बुरी फॉर्म का ही है तो फिर खिलाडी क्या करता है, ये बात मेरी आज तक समझ में नहीं आयी? क्या इनको इतना सारा पैसा सिर्फ गुड लक और बेड लक के आधार पर मिलता है या फिर उनकी खेल प्रतिभा पर/ क्या भारतीय क्रिकेट कुछ खिलाडियों क़ी वंशानुगत जागीर है? मीडिया प्रबंधन का इतना दुरूपयोग किस लिए? जब एक खिलाड़ी को उसकी ख़राब पर्फोर्मंस के आधार पर ब्रेक दे दिया तो दूसरे को क्यों नहीं? क्यों चयन समिति भी कुछ और चाहती है/ क्यों एक खिलाड़ी पर सारे प्रायोजित खेल खेले जाते हैं सोचो जरा—-भगवन क्रिकेट नहीं खेलते? ये नकली भगवान सिर्फ़ देश की भावनाओं से खेलकर धंधा करते हैं / ये ढोंग करते हैं कि हम देश के लिए खेलते हैं, ये ढोंग करते हैं कि ये देश के प्रति संवेदना रखते हैं / अभी हाल में बॉलीवुड एक्टर अक्षय्य कुमार ने 1. 08 करोड़ रूपये नक्सल हमलों में शहीद हुए जवानों के सहायतार्थ दिए / आज पूरा देश ऐसे एक्टर पर नाज करता है / यहाँ इस तथाकथित क्रिकेट के भगवान को पूछा जाना चाहिए कि आपकी देश भक्ति एवं भगवानता क्या सिर्फ देश में धन कमाने तक सीमित है क्या? अब तो भारत रत्न को भी आपने इस कलुषित धंधे में इस्तेमाल कर लिया / ये क्रिकेट के धर्म ध्वज रक्षक अपनी जेब से कुछ नहीं देंगे/ हाँ किसी सहायतार्थ ये मैच खेलकर उसका पचास प्रतिशत दान करके बाकी अपनी विलासिता के लिए गटक जायेंगे वो भी हमारे जेब से निकाल कर/ ईमान और नैतिकता भी कोई चीज होती मगर यहाँ तो किसी की मैयत की शोभा बढ़ाने लिए भी ये तथाकथित खिलाड़ी पैसे मांगते देखे गए/

आज जरुरत है पुनर्विचार करने की कि आखिर हम किधर जा रहे हैं और कलुषित धँधे वाले खेल हमारे खेल जगत को किधर ले जा रहे हैं/ सोचो ज़रा।

 

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